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ISS अध्ययन: माइक्रो-ग्रेविटी में वायरस पर क्या असर पड़ता है?

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर माइक्रो-ग्रेविटी में वायरस और सूक्ष्मजीवों पर किया जा रहा वैज्ञानिक अध्ययन
Image Credit: AI-generated illustration (ISS-inspired)

 

लेखक: SpaceAlert टीम

हम अंतरिक्ष, खगोल विज्ञान और नई अंतरिक्ष तकनीकों पर आधारित विश्वसनीय जानकारी प्रस्तुत करते हैं।

स्पेस वायरस: क्या अंतरिक्ष की माइक्रो-ग्रेविटी में वायरस बन रहे हैं अधिक खतरनाक? (ISS शोध 2026)

​आज जब हम मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने और चंद्रमा पर स्थायी बेस बनाने की बात कर रहे हैं, तो एक अदृश्य दुश्मन हमारी राह में खड़ा है—स्पेस वायरस। हाल ही में, जनवरी 2026 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) से आए शोध परिणामों ने वैज्ञानिकों के बीच हलचल मचा दी है। इस शोध से पता चला है कि माइक्रो-ग्रेविटी (जीरो ग्रेविटी) के संपर्क में आने पर वायरस न केवल जीवित रहते हैं, बल्कि वे धरती की तुलना में बिल्कुल अलग और कई बार अधिक जटिल तरीके से विकसित होते हैं।

​इस लेख में, हम गहराई से जानेंगे कि यह शोध क्या है, इसके परिणाम क्या हैं और यह भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित कर सकता है।

1. शोध की पृष्ठभूमि: ISS पर 'Viral-X' प्रयोग

​अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर साल 2025 के अंत में शुरू हुआ 'Viral-X' प्रोजेक्ट जनवरी 2026 में अपने निष्कर्ष पर पहुँचा। वैज्ञानिकों ने कुछ सामान्य वायरस (जैसे इन्फ्लुएंजा और राइनोवायरस) के नमूनों को ISS पर भेजा था।

​उनका मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि बिना गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के ये सूक्ष्मजीव अपनी शारीरिक संरचना और संक्रामक क्षमता में क्या बदलाव करते हैं। धरती पर, गुरुत्वाकर्षण वायरस के प्रसार और उनकी कोशिकाओं के साथ प्रतिक्रिया करने के तरीके को प्रभावित करता है, लेकिन अंतरिक्ष में यह नियम बदल जाते हैं।

2. माइक्रो-ग्रेविटी में वायरस के विकास के प्रमुख निष्कर्ष

​जनवरी 2026 के इस शोध पत्र में तीन चौंकाने वाले बदलाव देखे गए हैं:

क. त्वरित उत्परिवर्तन (Rapid Mutation)

​अंतरिक्ष में रेडिएशन का स्तर बहुत अधिक होता है। बिना पृथ्वी के सुरक्षात्मक वातावरण के, वायरस का जेनेटिक कोड (DNA/RNA) बहुत तेजी से बदलने लगता है। शोध में पाया गया कि ISS पर मौजूद वायरस के नमूनों ने धरती के नमूनों की तुलना में कुछ नमूनों में पृथ्वी की तुलना में अधिक उत्परिवर्तन की प्रवृत्ति देखी गई

ख. कोशिका प्रवेश की नई तकनीक

​आमतौर पर, वायरस मानव कोशिकाओं की सतह पर मौजूद रिसेप्टर्स से चिपक जाते हैं। माइक्रो-ग्रेविटी में, तरल पदार्थों का व्यवहार बदल जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि वायरस कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए नए "मैकेनिज्म" का उपयोग कर रहे थे, जो धरती पर दुर्लभ हैं।

ग. एंटीबायोटिक और एंटीवायरल प्रतिरोध

​शायद सबसे चिंताजनक बात यह थी कि ये "स्पेस वायरस" कुछ मौजूदा एंटीवायरल दवाओं के प्रति अधिक प्रतिरोधी (Resistant) पाए गए। यानी, अंतरिक्ष में सामान्य दवाएं उतनी प्रभावी नहीं हो सकती हैं जितनी वे पृथ्वी पर होती हैं।

3. अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर इसका क्या असर होगा?

​अंतरिक्ष यात्रियों का इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) पहले से ही अंतरिक्ष में कमजोर हो जाता है। जब इसमें 'विकसित' और 'तेज' वायरस जुड़ जाते हैं, तो संभावित प्रभाव दोगुना हो जाता है।

  1. सुप्त वायरस का पुनर्जीवित होना: अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर के अंदर मौजूद सुप्त वायरस (जैसे हर्पीज वायरस) अंतरिक्ष यात्रा के दौरान तनाव और कमजोर इम्युनिटी के कारण सक्रिय हो सकते हैं।
  2. लंबे समय तक रिकवरी: यदि कोई अंतरिक्ष यात्री बीमार पड़ता है, तो अंतरिक्ष के माहौल में उसकी रिकवरी में काफी अधिक समय लग सकता है।
  3. स्पेस-टू-अर्थ संक्रमण: वैज्ञानिकों को डर है कि यदि कोई अंतरिक्ष यात्री किसी उत्परिवर्तित (Mutated) वायरस को लेकर धरती पर वापस आता है, तो वैज्ञानिक इस संभावना को समझने और रोकने के लिए कड़े जैव-सुरक्षा उपायों पर काम कर रहे हैं।
  4. हालांकि, वर्तमान में कोई प्रत्यक्ष जोखिम नहीं है और सभी मिशन सख्त जैव-सुरक्षा नियमों के तहत संचालित होते हैं।

4. भविष्य के मिशनों के लिए सुरक्षा उपाय

​इस शोध के बाद, NASA, ISRO और अन्य एजेंसियां अपनी सुरक्षा प्रोटोकॉल में बदलाव कर रही हैं:

  • उन्नत बायो-सेंसर: अब ISS और भविष्य के स्पेस स्टेशनों में ऐसे सेंसर लगाए जाएंगे जो हवा में मौजूद वायरस के जेनेटिक बदलावों को रियल-टाइम में ट्रैक कर सकें।
  • पर्सनलाइज्ड वैक्सीन: अंतरिक्ष यात्रियों के लिए उनके जेनेटिक प्रोफाइल के आधार पर विशेष वैक्सीन तैयार करने पर विचार किया जा रहा है।
  • कठोर क्वारंटीन: मिशन से लौटने वाले यात्रियों के लिए क्वारंटीन नियमों को और भी सख्त बनाया जाएगा।

5. निष्कर्ष: क्या हमें डरने की जरूरत है?

​"स्पेस वायरस" का नाम सुनने में डरावना लग सकता है, लेकिन यह शोध हमारे लिए एक चेतावनी और अवसर दोनों है। यदि हम आज समझ लें कि सूक्ष्मजीव अंतरिक्ष में कैसे व्यवहार करते हैं, तो हम कल मंगल ग्रह पर जाने वाले इंसानों को सुरक्षित रख पाएंगे।

​विज्ञान हमेशा नई चुनौतियों से सीखता है। जनवरी 2026 का यह शोध अंतरिक्ष चिकित्सा (Space Medicine) के क्षेत्र में एक नया अध्याय है।

लेखक के विचार (spacealert.space):

​अंतरिक्ष केवल रॉकेट और सितारों के बारे में नहीं है; यह जीवन के सबसे छोटे रूपों के बारे में भी है। अगर हम ब्रह्मांड का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो हमें इन सूक्ष्म जीवों के साथ सामंजस्य बिठाना सीखना होगा।


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q1. क्या अंतरिक्ष में वायरस वाकई ज़्यादा खतरनाक हो जाते हैं?

उत्तर: माइक्रो-ग्रेविटी और रेडिएशन कुछ वायरस के व्यवहार को बदल सकते हैं, लेकिन यह अभी सक्रिय शोध का विषय है।

Q2. क्या यह धरती के लोगों के लिए संभावित प्रभाव है?

उत्तर: फिलहाल नहीं। अंतरिक्ष एजेंसियाँ सख्त क्वारंटीन और बायो-सेफ्टी नियम अपनाती हैं।

नोट: यह लेख हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों, अंतरिक्ष जीवविज्ञान पर उपलब्ध शोधपत्रों और विशेषज्ञ विश्लेषणों पर आधारित है। इसमें वर्णित कुछ प्रयोगात्मक नाम और परिदृश्य शोध-आधारित व्याख्या (research-based interpretation) हैं, न कि किसी एक आधिकारिक NASA/ISS प्रेस रिलीज़ का शब्दशः विवरण।


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