अंतरिक्ष में कांच की बारिश? JWST ने प्रोटोस्टार EC 53 के पास देखे चमकीले सिलिकेट क्रिस्टल
ब्रह्मांड के रहस्य: प्रोटोस्टार EC 53 और जेम्स वेब टेलीस्कोप की अद्भुत खोज - कैसे बनते हैं तारों के बीच क्रिस्टल?
ब्रह्मांड की उत्पत्ति और तारों का जन्म हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय रहा है। हाल ही में, नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) ने एक ऐसी तस्वीर खींची है जिसने खगोल विज्ञान की दुनिया में हलचल मचा दी है। यह खोज है प्रोटोस्टार EC 53 की, जो सर्पेंस नेबुला (Serpens Nebula) में स्थित एक नवजात तारा है। इस खोज की सबसे खास बात यह है कि इसने हमें यह समझने में मदद की है कि तारों के निर्माण के दौरान 'सिलिकेट क्रिस्टल' (Silicate Crystals) कैसे बनते हैं।
आज के इस लेख में हम गहराई से जानेंगे कि प्रोटोस्टार EC 53 क्या है, सर्पेंस नेबुला की खासियत क्या है और जेम्स वेब टेलीस्कोप की इस खोज का हमारे विज्ञान के लिए क्या महत्व है।
1. प्रोटोस्टार EC 53 क्या है? (What is Protostar EC 53?)
एक 'प्रोटोस्टार' वह तारा होता है जो अभी अपने जन्म की प्रारंभिक अवस्था में है। सरल शब्दों में कहें तो, यह एक "भ्रूण तारा" है जो गैस और धूल के विशाल बादलों के बीच आकार ले रहा है।
- स्थान: यह तारा पृथ्वी से लगभग 1,300 प्रकाश वर्ष दूर सर्पेंस नेबुला में स्थित है।
- अवस्था: EC 53 अभी अपनी 'वृद्दि अवस्था' में है, जहाँ यह आसपास की धूल और गैस को अपनी ओर खींच रहा है।
- चमक का रहस्य: वैज्ञानिकों ने पाया कि इसकी चमक में समय के साथ उतार-चढ़ाव होता है, जिसे 'पीरियोडिक फ्लेयरिंग' कहा जाता है।
2. सर्पेंस नेबुला: तारों की नर्सरी
सर्पेंस नेबुला को 'तारों की नर्सरी' कहा जाता है क्योंकि यहाँ एक साथ सैकड़ों नए तारों का जन्म हो रहा है। जेम्स वेब टेलीस्कोप की इन्फ्रारेड दृष्टि ने धूल की उन परतों को पार कर लिया है जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था।
सर्पेंस नेबुला में तारों के बीच जो टकराव और हलचल होती है, वह हमें हमारे सौर मंडल के शुरुआती दिनों की याद दिलाती है। EC 53 जैसे तारे हमें बताते हैं कि अरबों साल पहले हमारा सूर्य कैसे बना होगा।
3. सिलिकेट क्रिस्टल की खोज: धूल से कांच तक का सफर
इस खोज का सबसे रोमांचक हिस्सा है सिलिकेट क्रिस्टल (Silicate Crystals) की मौजूदगी। सिलिकेट वही खनिज हैं जो पृथ्वी पर चट्टानों और रेत (बालू) में पाए जाते हैं।
क्रिस्टल कैसे बनते हैं?
अंतरिक्ष की कड़कड़ाती ठंड में धूल के कण आमतौर पर अनाकार (amorphous) होते हैं, यानी उनका कोई निश्चित आकार नहीं होता। लेकिन EC 53 के पास JWST ने पाया कि ये कण क्रिस्टल के रूप में बदल रहे हैं।
- गर्मी का प्रभाव: जब प्रोटोस्टार से निकलने वाली ऊर्जा धूल को गर्म करती है, तो यह धूल पिघलकर फिर से ठंडी होती है, जिससे सुंदर क्रिस्टल बनते हैं।
- प्रक्रिया: इसे 'एनिलिंग' (Annealing) कहा जाता है। यह ठीक वैसी ही प्रक्रिया है जैसे पृथ्वी पर कारखानों में कांच बनाया जाता है।
4. जेम्स वेब टेलीस्कोप (JWST) की भूमिका
हबल टेलीस्कोप जैसे पुराने टेलीस्कोप धूल के घने बादलों के पार नहीं देख सकते थे। लेकिन JWST में लगे MIRI (Mid-Infrared Instrument) ने इस बाधा को दूर कर दिया है।
- इन्फ्रारेड जादू: गर्मी का पता लगाकर JWST ने EC 53 के चारों ओर घूमती धूल के "फिंगरप्रिंट" को पकड़ा।
- बारीकी: JWST ने न केवल क्रिस्टल को देखा, बल्कि यह भी बताया कि ये क्रिस्टल ओलिविन (Olivine) और पायरोक्सिन (Pyroxene) जैसे खनिजों से बने हैं, जो पृथ्वी के क्रस्ट में भी पाए जाते हैं।
5. यह खोज हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
आप सोच सकते हैं कि 1,300 प्रकाश वर्ष दूर किसी तारे पर धूल का क्रिस्टल बनने से हमें क्या फर्क पड़ता है? दरअसल, इसके तीन बड़े कारण हैं:
- ग्रहों का निर्माण: पृथ्वी जैसे चट्टानी ग्रह इसी तरह की धूल और क्रिस्टल के आपस में जुड़ने से बनते हैं। अगर हम इन क्रिस्टल को समझ लें, तो हम समझ पाएंगे कि पृथ्वी कैसे बनी।
- जीवन की संभावना: सिलिकेट क्रिस्टल का होना यह संकेत दे सकता है कि उस तारे के चारों ओर भविष्य में रहने योग्य ग्रह बन सकते हैं।
- ब्रह्मांडीय रसायन विज्ञान: यह हमें बताता है कि ब्रह्मांड के हर कोने में वही रसायनों का खेल चल रहा है जो हमारी पृथ्वी पर है।
6. भविष्य की संभावनाएँ
प्रोटोस्टार EC 53 की खोज तो बस शुरुआत है। वैज्ञानिक अब यह देख रहे हैं कि क्या ये क्रिस्टल उस तारे के चारों ओर एक "डिस्क" बना रहे हैं। भविष्य में यही डिस्क ग्रहों, धूमकेतुओं और चंद्रमाओं में बदल जाएगी।
जेम्स वेब टेलीस्कोप की मदद से हम अब अंतरिक्ष के उन 'काले कोनों' में झांक पा रहे हैं जहाँ कभी देखना असंभव माना जाता था।
निष्कर्ष (Conclusion)
प्रोटोस्टार EC 53 की तस्वीरें सिर्फ सुंदर छवियां नहीं हैं, बल्कि ये ब्रह्मांड की प्रयोगशाला के लाइव दृश्य हैं। यह खोज हमें याद दिलाती है कि हम सब "सितारों की धूल" (Stardust) से बने हैं। सर्पेंस नेबुला में बन रहे ये सिलिकेट क्रिस्टल कल के नए ग्रहों की नींव हैं।
विज्ञान और तकनीक की जुगलबंदी ने हमें उस रहस्य के करीब पहुँचा दिया है जहाँ से जीवन की शुरुआत होती है।

कोई टिप्पणी नहीं